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घुटन

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घुटन उसकी आँखे धधक रही थी , अँगारे   की तरह , लावा की तरह उबल रहा था , बदन का लहू , फिर   वो अपने घुटनो के बल   बैठ गया , कभी वो आसमान का खलीपन देखता , कभी अपने अँदर का , फिर उसकी आँखौ के अँगारे , पानी की बूंदो में बदल गए , पानी की ये बूंदे धरती पर गिरने लगी , आज फिर उसने बुझा ली अपने पेट की आग , पानी पीकर , फिर आसमान ने उसे चादर दिया औऱ कहा , आज   ठिठुरने नही दुंगा , ठँड से तुझे , आसमान ने उसे जो चादर दिया थी , वाह नही ढँक पाइ उसका बदन , जांहा से फटे थे उसके कापड़े . धरती ने कहा आज सोजा तू मेरी गोद में तुझे नहीं होने दुंगी कोई तकलीफ , फिर वो रात भर करवट बदल-बदल कर सोता रहा , चैन की नींद , उसके बदन भऱा हुआ था , जखमों से , हवा ने कहा रात भर में , भऱ दुंगी तुमहारे सारे जखम , फिर सुबह हवा ने कहा समय नही है मेरे पास , मैं थक गई हूँ औऱ बहुत गहरे है तुम्हारे जखम , याद आज फिर भीग गया मैं तरबतर , तुम्हारी याद में। . भर ...
दिन ढलते ढलते घिर आती है तेरी याद एक बूँद है जो अब आता नहीं, मुट्ठी में मेरी बन गया है सागर, रूठ के फुट पड़ता है, एक बीज दिल के सूने कोने में जवान होती है रात के साथ बन जाता है एक विशाल वृक्ष उसके  जड़ो की जाल में मैं  फस जाता हूँ एक पर कटे पंछी की तरह जकड लेती है , मुझे ये उतनी ही बेरहम है जितनी तू है शायद तूने मना किया है उसको की बस, मरने नहीं देती। -राजेश कुमार