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मै और दो लाख पचपन हज़ार पांच सौ जहर की पुड़िया भाग# १ हम चाहकर भी जहर नहीं खा सकते।  चाहे उस जहर की खाने से कितना भी पैसा मिल रहा हो या किसी को कितना भी फायदा हो रहा हो। पॉलीथीन का सबसे ज्यादा कचरा घरो से निकलता है।  जब लोग मार्केट जाते है, किराने का सामान लेने, सब्जी, फल, दवाई या दूध लाने तो लोग हर चीज के लिए एक पॉलीथीन दूकानदार से मांगते है।  और इसका नतीजा या होता है की रोज़ ही हर घर में कम से कम 10 पॉलीथीन तो आ ही जाती है। इस तरह से हर घर से हर महीने कम से कम ३०० पॉलीथीन सड़क पे, नाले में, गार्डन में या कचरा घर में पहुंच ही जाती है।  जो सीधे लोगो की सेहत नुक्सान पहुँचाती है। और इसका प्रॉपर तरीके से डिस्पोज़ करने के लिए जो पैसा खर्च करना पड़ता है वो अलग। वैसे तो शुरू से ही मुझे पॉलीथीन का उपयोग मुझे पसंद नहीं है। मैने हमेशा से ही इसको इस्तमाल करने में परहेज किया है। पर पिछले 7 सालो में  मैने पॉलीथीन का उपयोग बंद ही कर दिया है। मैंने  पिछले 7 सालो से किसी भी प्रकार भी प्रकार की पॉलीथीन को अपने घर में लाना बंद कर दिया। मैं हमेशा अपने पास एक बैग रखता हू...
गुलमोहर का फूल याद है तुम्हें आज के दिन की सुबह वो तपन से पहले की, ठंडक मैं चुरा के ले लाया था प्लेटफार्म से थोड़ी धूप तुम्हारे लिए तुम्हारे सावले रंग की चमक से चकचौंधियाँ गई थी आँखे मेरी गुलमोहर के फूल के रंग सी चटक तुम गिरी थी आकर बाँहो में मेरे कटार से तेज तुम्हारी नज़रो से घायल दिल बेजान ही पड़ा रहा दिन भर हारते रहा मैं तुमसे आंख मिचौली का खेल उस रात चाँद भी गा रहा था, लोरियाँ की वो भी कर रहा था नाकाम कोशिश तुम्हें को सुलाने की और हम भी चाँद की हद से दूर खेल रहे थे चाय की पत्ती पोसम पाओ उस रात नदी किनारे चलते-चलते उतर गया था मैं आँखों में तुम्हारी तब से डूब ही रहा हूँ थाह नहीं है तुम्हारी आँखों की, गहराई की शायद लग जायँगे कई जनम उबरते उबरते !! ~ राजेश
जब मैं पूर्ण विकसित हो जाऊँगा, तो पेड़ हो जाऊंगा फिर तुम अमर बेल बन कर, मुझे पे छा जाना। जब सूरज अंनत व्योम में, चलते चलते रुक जायगा तब दुनिया की सारी संस्कृति, का पेड़ हो जायँगे, दुनिया के सारे जीव पेड़ हो जायेंगे फिर रुक जायगी,विकास की क्रिया फिर पता चलेगा की सुकरात, कबीर बहुत पहले पेड़ हो गए थे। मीरा पहले से ही पेड़ थी, जंगल हो जाना ही विकास की अंतिम लक्ष्य है ~ राजेश