गुलमोहर का फूल याद है तुम्हें आज के दिन की सुबह वो तपन से पहले की, ठंडक मैं चुरा के ले लाया था प्लेटफार्म से थोड़ी धूप तुम्हारे लिए तुम्हारे सावले रंग की चमक से चकचौंधियाँ गई थी आँखे मेरी गुलमोहर के फूल के रंग सी चटक तुम गिरी थी आकर बाँहो में मेरे कटार से तेज तुम्हारी नज़रो से घायल दिल बेजान ही पड़ा रहा दिन भर हारते रहा मैं तुमसे आंख मिचौली का खेल उस रात चाँद भी गा रहा था, लोरियाँ की वो भी कर रहा था नाकाम कोशिश तुम्हें को सुलाने की और हम भी चाँद की हद से दूर खेल रहे थे चाय की पत्ती पोसम पाओ उस रात नदी किनारे चलते-चलते उतर गया था मैं आँखों में तुम्हारी तब से डूब ही रहा हूँ थाह नहीं है तुम्हारी आँखों की, गहराई की शायद लग जायँगे कई जनम उबरते उबरते !! ~ राजेश
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जब मैं पूर्ण विकसित हो जाऊँगा, तो पेड़ हो जाऊंगा फिर तुम अमर बेल बन कर, मुझे पे छा जाना। जब सूरज अंनत व्योम में, चलते चलते रुक जायगा तब दुनिया की सारी संस्कृति, का पेड़ हो जायँगे, दुनिया के सारे जीव पेड़ हो जायेंगे फिर रुक जायगी,विकास की क्रिया फिर पता चलेगा की सुकरात, कबीर बहुत पहले पेड़ हो गए थे। मीरा पहले से ही पेड़ थी, जंगल हो जाना ही विकास की अंतिम लक्ष्य है ~ राजेश