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गुलमोहर का फूल

गुलमोहर का फूल  याद है तुम्हें  आज के दिन की सुबह वो तपन से पहले की, ठंडक  मैं चुरा के ले लाया था  प्लेटफार्म से थोड़ी धूप तुम्हारे लिए  तुम्हारे सावले रंग की  चमक से चकचौंधियाँ गई थी  आँखे मेरी गुलमोहर के फूल के रंग सी चटक तुम गिरी थी  आकर बाँहो में मेरे  कटार से तेज  तुम्हारी नज़रो से घायल दिल बेजान ही पड़ा रहा  दिन भर हारते रहा मैं तुमसे  आंख मिचौली का खेल उस रात चाँद भी गा रहा था, लोरियाँ  की वो भी कर रहा था नाकाम कोशिश  तुम्हें को सुलाने की और हम भी चाँद की हद से दूर  खेल रहे थे चाय की पत्ती पोसम पाओ उस रात  नदी किनारे चलते-चलते उतर गया था मैं आँखों में तुम्हारी  तब से  डूब ही रहा हूँ थाह नहीं है तुम्हारी  आँखों की, गहराई की शायद लग जायँगे  कई जनम उबरते उबरते !! ~ राजेश

भार

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तराजू के पड़ले में रखा हुआ भार, तराजू पे नही होता। थकी हुई आंखों में होता है। ब्याज का भार हमेशा उतना नही होता, जितना भार,नींद की झपकी का होता है। दोस्त किये गए वादा का भार, उतरता नही कभी, पीठ से चिपका रहता है पसीना बनकर । गाँव के कंधों में शहर का भार इतना नही होता, जितना गाँव वापस न आ पाने का होता है। नाँव और बेटी का भार नही होता, सारे भार आकर, रुक जाते है, स्त्री की पीठ में स्त्री, कमर दर्द के साथ ही पैदा होती है। ~राजेश