भार
तराजू के पड़ले में रखा हुआ भार,
तराजू पे नही होता।
थकी हुई आंखों में होता है।
ब्याज का भार हमेशा उतना नही होता,
जितना भार,नींद की झपकी का होता है।
दोस्त किये गए वादा का भार,
उतरता नही कभी,
पीठ से चिपका रहता है पसीना बनकर ।
गाँव के कंधों में
शहर का भार इतना नही होता,
जितना गाँव वापस न आ पाने का होता है।
नाँव और बेटी का भार नही होता,
सारे भार आकर,
रुक जाते है, स्त्री की पीठ में
स्त्री, कमर दर्द के साथ ही पैदा होती है।
~राजेश
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