घुटन
घुटन उसकी आँखे धधक रही थी , अँगारे की तरह , लावा की तरह उबल रहा था , बदन का लहू , फिर वो अपने घुटनो के बल बैठ गया , कभी वो आसमान का खलीपन देखता , कभी अपने अँदर का , फिर उसकी आँखौ के अँगारे , पानी की बूंदो में बदल गए , पानी की ये बूंदे धरती पर गिरने लगी , आज फिर उसने बुझा ली अपने पेट की आग , पानी पीकर , फिर आसमान ने उसे चादर दिया औऱ कहा , आज ठिठुरने नही दुंगा , ठँड से तुझे , आसमान ने उसे जो चादर दिया थी , वाह नही ढँक पाइ उसका बदन , जांहा से फटे थे उसके कापड़े . धरती ने कहा आज सोजा तू मेरी गोद में तुझे नहीं होने दुंगी कोई तकलीफ , फिर वो रात भर करवट बदल-बदल कर सोता रहा , चैन की नींद , उसके बदन भऱा हुआ था , जखमों से , हवा ने कहा रात भर में , भऱ दुंगी तुमहारे सारे जखम , फिर सुबह हवा ने कहा समय नही है मेरे पास , मैं थक गई हूँ औऱ बहुत गहरे है तुम्हारे जखम , याद आज फिर भीग गया मैं तरबतर , तुम्हारी याद में। . भर ...