दिन ढलते ढलते
घिर आती है तेरी याद
एक बूँद है जो
अब आता नहीं, मुट्ठी में मेरी
बन गया है सागर, रूठ के
फुट पड़ता है, एक बीज
दिल के सूने कोने में
जवान होती है रात के साथ
बन जाता है एक विशाल वृक्ष
उसके जड़ो की जाल में
मैं फस जाता हूँ
एक पर कटे पंछी की तरह
जकड लेती है , मुझे
ये उतनी ही बेरहम है जितनी तू है
शायद तूने मना किया है उसको
की बस, मरने नहीं देती।
-राजेश कुमार
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