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Showing posts from 2021

तुम्हारी तरह

~शरण्येत्र्यंबके ~ ये दुनिया बहुत ही सुंदर है बिखरे है हजारो रंग, इसमे ध्यान से देखो बेटी अपनी नन्ही आँखो से शांत नही होने देना इनकी जिज्ञासाओं को, कभी खिड़की चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,  बाँध नही सकती तुम्हे इसकी कोई सीमा देख सकते हो तुम क्षितिज के उस पार भी अनंत तक सुनना नही कभी भी इस दुनिया की चाहे कोई भी हो, वही करना जो तुम्हारा मन चाहे अपने ही रंगों से भरना  अपने रंग, अपने पंखों को फैलाकर उड़ जाना, जहाँ मन चाहे डरना नही कभी भी  गिरने से, जितनी बार गिरोगे  उतना ही बड़ा होगा  सफलताओ का पर्वत इस धरती का कोई भी कोना तुम्हारे कदमो की सीमाओं के परे नही है इसकी परिधि तुम्हारे जिद के आगे  छोटी है बहुत तुम्हारे कदम छोटे ही सही जहाँ भी जाओ छोड़ आना अपने कदमो के निशां कभी कोशिश भी नही करना किसी ओर की तरह बनने की दिखने की क्यों कि तुम ही हो, तुम्हारी तरह याद रखना तुम्हारे जैसा कोई और नही ~ राजेश

गुलमोहर का फूल

गुलमोहर का फूल  याद है तुम्हें  आज के दिन की सुबह वो तपन से पहले की, ठंडक  मैं चुरा के ले लाया था  प्लेटफार्म से थोड़ी धूप तुम्हारे लिए  तुम्हारे सावले रंग की  चमक से चकचौंधियाँ गई थी  आँखे मेरी गुलमोहर के फूल के रंग सी चटक तुम गिरी थी  आकर बाँहो में मेरे  कटार से तेज  तुम्हारी नज़रो से घायल दिल बेजान ही पड़ा रहा  दिन भर हारते रहा मैं तुमसे  आंख मिचौली का खेल उस रात चाँद भी गा रहा था, लोरियाँ  की वो भी कर रहा था नाकाम कोशिश  तुम्हें को सुलाने की और हम भी चाँद की हद से दूर  खेल रहे थे चाय की पत्ती पोसम पाओ उस रात  नदी किनारे चलते-चलते उतर गया था मैं आँखों में तुम्हारी  तब से  डूब ही रहा हूँ थाह नहीं है तुम्हारी  आँखों की, गहराई की शायद लग जायँगे  कई जनम उबरते उबरते !! ~ राजेश

भार

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तराजू के पड़ले में रखा हुआ भार, तराजू पे नही होता। थकी हुई आंखों में होता है। ब्याज का भार हमेशा उतना नही होता, जितना भार,नींद की झपकी का होता है। दोस्त किये गए वादा का भार, उतरता नही कभी, पीठ से चिपका रहता है पसीना बनकर । गाँव के कंधों में शहर का भार इतना नही होता, जितना गाँव वापस न आ पाने का होता है। नाँव और बेटी का भार नही होता, सारे भार आकर, रुक जाते है, स्त्री की पीठ में स्त्री, कमर दर्द के साथ ही पैदा होती है। ~राजेश

जूता

जूता, (भाग #1) आदमी के पास होते है  दो पैर, उन पैरो में होता है जूता  जूतों को बनाते है  हाथ  हाथो के पास होती है  कला  सब हाथों में नहीं  सिर्फ कुछ ही हाथ ये हाथ होते है  चर्मकारों के पास  मरे हुए जानवरो के चमड़े से  जूता बनने का रास्ता होता है लम्बा  चर्मकार काका बनाते थे जूता अब नहीं बनाते अब कहानी सुनाते है  कहते है जगली सूअर का चमड़ा  बहुत ही सख्त होता है  सिपाहियों के जूते बनते है उससे  इतना मजबूत की  बन्दूक की गोली भी  नही कर पाती छेद अब आँखों से बराबर दिखता नहीं  और बेटा भला हो सरकार का बेटा की नौकरी लग गई है  जूते बनाने वाली फक्ट्री में  और तुम हमारा क्या है  अब तो बनिये बनाते है  जूते ~राजेश Thanks rajesh for sharing this into public domain

प्रेम का समीकरण

प्रेम का समीकरण  तुम्हारा होने के बराबर  मेरा होना है  या यूँ कहु  तुम्हारे होना ही मेरा होना है। बहुत सरल है  प्रेम का समीकरण  अगर मैं  मुझ में  खुद को जोड़ता हूँ  तो  तुम बन जाते हो अगर मैं  तुम में  मुझ को जोड़ता हूँ  तब भी तुम बन जाते हो अगर मैं  तुम में  तुम को जोड़ता हूँ  तब भी   तुम बन जाते हो अगर मैं  मुझ में  तुम को जोड़ता हूँ  तब भी तुम बन जाते हो अगर मैं   मुझ में से  खुद को घटाता हूँ  तब तुम बच जाते हो अगर मैं  तुम में से  मुझ को घटाता हूँ  तब भी  तुम बच जाते हो अगर मैं  तुम से  तुम्हे घटाता हूँ  तब भी तुम ही बच जाते हो अगर मैं  मुझ में से  तुम्हे घटाता हूँ  तो  तो कुछ नहीं बचता  कुछ भी नहीं  मैं भी नही  शून्य भी नहीं  निर्वात भी नहीं। -राजेश कुमार

पिताजी और नींद

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 सबेरे ही  उठ जाते हैं पिताजी मैं सोता हूँ देर तक  गुस्सा होते है  रोज  मेरे देर तक सोने से  मेरे उठने के बाद   देर तक आती है  उनके डाँटने की आवाज़  बहुत देर तक  सुनाई देती है  कठोर जीवन की निष्ठुरता  और दुनिया की कटुता का पाठ  मेरी नींद के हर हिस्सों में  शामिल है  उनके के हिस्से की नींद नींद का जितने हिस्से   पिताजी सोये नहीं  उन्ही में से कुछ हिस्सों को बटोर कर  बेफिकर सोता हूँ मैं  मेरे जागने के बाद  पिताजी भले ही कितना भी  गुस्सा करे  पर कभी जागते नहीं है  नींद से मुझे  अच्छे से निश्चित करते है की  मैं जब तक भी सोता रहूँ  आये नहीं कोई बाधा मेरी चैन नींद में।  ~ राजेश

अर्थ

मेरे गॉव को जरुरत है  उतने ही मोची की  जो बना सके उतने ही जूते  जिनते पाव है गांव में  उतने ही दर्जी की  जो सिल सके गांव के सारे  लोगो के कपडे  उतने ही व्यापारी की  जो ला सके शहर से उतना ही सामान  जितना जरुरत हो गॉव में  उतने ही किसान  जो कर पैदा कर सके उतना ही अनाज  जिससे पर्याप्त हो गांव के लोगो को  और याचक को भी मिल जाए  उसका हिस्सा एक शिक्षक  जो पढ़ा सके स्वाबलंबन का पाठ  एक वैद्य की जो  जो कर सके मौसमी बीमारी का इलाज  एक राजा इस बात का नियंत्रण कर सके, की  अनाज के बदले  किसानो को मिल जाए  कपडे, हल, और सोने लिए खाट  अगर ये भी न हो तो  कम कम से इतना सुनिश्चत करे, की  शहर का ,कोई भी आदमी  घुस न  सके गॉव में। ~ राजेश