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तुम्हारे भीतर

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तुम्हारे भीतर अब तुम  भूल जाओ मैं जा रही हू तुमसे दूर, बहुत दूर इतनी दूर की तुम चाहो मुझे ढूंढ़ना तो नहीं ढूढ़ पाओगे इसलिए नहीं करना कोई कोशिश तुम प्रिय , क्या कभी तुम, मेरे इतने पास थी, मैं तो सदा से ही, दूर था तुमसे क्या तुम्हे याद है की अंतिम बार किस क्षण, तुमने छुआ था मेरा हृदय तुम चाहे तो कितने भी दूर चले जाओ कुछ  ही क्षण के लिए सही क्या मुमकिन है तुम्हारा मेरे ह्रदय से जाना जा रहे हो तो इन्हे भी अपने साथ ही ले जाओ  तुम्हारी कुछ चीजे जो मेरे पास है कुछ तुम्हारी साँसे घुली हुई है यहाँ की फ़िज़ा मे इस कमरे के एक कोने में खनखना रही है  तुम्हारी हँसी जब तुम मुझसे झूठमूठ रूठ जाती थी, उन पलो को मैंने,सम्हाल के रखा है एक  संदूक में रुको मै लौटा देता हूँ तुम्हे, वो सारे पल भी , अपने वदन की तपिश भी साथ ले जाओ, यही कही है बिस्तरों के सिलवटों में और भी कई चीजे है मै बताना नहीं चाहता पर तुम्हे लगता है तुम्हारी है तो उन्हें भी ले जाओ पर सुनो प्रिय तुम्हे ढूढ़ने  लिए ये दुनिया अपने घर के आँगन से बड़ी नहीं है बहुत हुआ तो आँगन के ...

यादे

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कल रात चाँद आया था , खेलने अपने घर की छत में, पूछ रहा , की तुम कैसी हो, सच कहु ,मैंने सच बताया ही नहीं, मैंने कहा की, मैंने छुपा के रखा है उसे, दुनिआ की नज़र से, मुझे अच्छा लगता है। तुम्हारे साथ होने से, अब भी जलती है दुनिआ , शायद ये दुनिआ जानती ही नहीं, की अब तुम मेरे साथ नहीं हो। - राजेश कुमार

घुटन

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घुटन उसकी आँखे धधक रही थी , अँगारे   की तरह , लावा की तरह उबल रहा था , बदन का लहू , फिर   वो अपने घुटनो के बल   बैठ गया , कभी वो आसमान का खलीपन देखता , कभी अपने अँदर का , फिर उसकी आँखौ के अँगारे , पानी की बूंदो में बदल गए , पानी की ये बूंदे धरती पर गिरने लगी , आज फिर उसने बुझा ली अपने पेट की आग , पानी पीकर , फिर आसमान ने उसे चादर दिया औऱ कहा , आज   ठिठुरने नही दुंगा , ठँड से तुझे , आसमान ने उसे जो चादर दिया थी , वाह नही ढँक पाइ उसका बदन , जांहा से फटे थे उसके कापड़े . धरती ने कहा आज सोजा तू मेरी गोद में तुझे नहीं होने दुंगी कोई तकलीफ , फिर वो रात भर करवट बदल-बदल कर सोता रहा , चैन की नींद , उसके बदन भऱा हुआ था , जखमों से , हवा ने कहा रात भर में , भऱ दुंगी तुमहारे सारे जखम , फिर सुबह हवा ने कहा समय नही है मेरे पास , मैं थक गई हूँ औऱ बहुत गहरे है तुम्हारे जखम , याद आज फिर भीग गया मैं तरबतर , तुम्हारी ...

रागनी

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घुटन   उसकी आँखे धधक रही थी , अँगारे   की तरह , लावा की तरह उबल रहा था , बदन का लहू , फिर   वो अपने घुटनो के बल   बैठ गया , कभी वो आसमान का खलीपन देखता , कभी अपने अँदर का , फिर उसकी आँखौ के अँगारे , पानी की बूंदो में बदल गए , पानी की ये बूंदे धरती पर गिरने लगी , आज फिर उसने बुझा ली अपने पेट की आग , पानी पीकर , फिर आसमान ने उसे चादर दिया औऱ कहा , आज   ठिठुरने नही दुंगा , ठँड से तुझे , आसमान ने उसे जो चादर दिया थी , वाह नही ढँक पाइ उसका बदन , जांहा से फटे थे उसके कापड़े . धरती ने कहा आज सोजा तू मेरी गोद में तुझे नहीं होने दुंगी कोई तकलीफ , फिर वो रात भर करवट बदल-बदल कर सोता रहा , चैन की नींद , उसके बदन भऱा हुआ था , जखमों से , हवा ने कहा रात भर में , भऱ दुंगी तुमहारे सारे जखम , फिर सुबह हवा ने कहा समय नही है मेरे पास , मैं थक गई हूँ औऱ बहुत गहरे है तुम्हारे जखम , याद आज फिर भीग गया मैं तरबतर , ...