रागनी
घुटन
उसकी आँखे धधक
रही थी, अँगारे की तरह,
लावा की तरह उबल
रहा था, बदन का लहू,
फिर वो अपने घुटनो के बल बैठ गया,
कभी वो आसमान का
खलीपन देखता, कभी अपने अँदर का,
फिर उसकी आँखौ के
अँगारे, पानी की बूंदो में बदल गए,
पानी की ये बूंदे
धरती पर गिरने लगी,
आज फिर उसने बुझा
ली अपने पेट की आग, पानी पीकर,
फिर आसमान ने उसे
चादर दिया औऱ कहा,
आज ठिठुरने नही दुंगा, ठँड से तुझे,
आसमान ने उसे जो
चादर दिया थी,
वाह नही ढँक पाइ
उसका बदन,
जांहा से फटे थे
उसके कापड़े .
धरती ने कहा आज
सोजा तू मेरी गोद में
तुझे नहीं होने
दुंगी कोई तकलीफ,
फिर वो रात भर
करवट बदल-बदल कर सोता रहा,
चैन की नींद,
उसके बदन भऱा
हुआ था, जखमों से,
हवा ने कहा रात
भर में , भऱ दुंगी तुमहारे सारे
जखम,
फिर सुबह हवा ने
कहा समय नही है मेरे पास,
मैं थक गई हूँ
औऱ बहुत गहरे है
तुम्हारे जखम,
याद
आज फिर भीग गया
मैं तरबतर, तुम्हारी याद में। .
भर गया भीतर तक, जहाँ जहाँ से खाली था मैं। ।
आज फिर से उतर
गया मैं , तुम्हारे बदन से। .
पड़ा रह गया मैं
बेजान सा, जैसे मर गया हूँ ।
बारिश की बूँद जल
रही मेरे बदन में ,
धधक रही मेरे
सीने में , तुम्हारी याद बनकर।
अपने बदन की
मिटटी से भर दो
जहाँ जहाँ से खली
हूँ , मैं।
साँसों की रागनी
घुल गया चाँद
आँखों में तुम्हारी।
सांसों की लय छेड़ रही है। रागनी
मेरे दिल की
तरंगे उठ रही है तुम्हारे दिल से।
सब कुछ रुका हुआ
सा, थमा हुआ सा।
थाम के सांसो की
डोर
रागनी ले उडी अपने साथ
कभी इस डाल में
कभी उस डाल में,
इतरा रही है ,
इठला रही है।
बिना छुए ही मिल
गए है, दो बदन
उलझ गए है,
बदन के अंग
सिमट गया है ,सारा आँसमा
दो बाँहो
में।
सारी मदहोशी फ़ैल
गई है जंगल में
बदन से निकल कर ,
लिपट गई है।
पेड़ो से बेल की
तरह।
भोर का तारा
शाम की जवानी पिघल पिघल के घुल रही है रात में ,
और पंछी सो गए है अपने घरौंदों में , चौच में सुनहरा सपना संजोय।
जिंदगी के साथ चल कर , बिछड़ के खड़ा हूँ खुद से बहुत दूर।
बेजान नाड़ियों से, लहू की दीवारो को चीर कर उठती है एक आह।
रुक जाती है हलक में आकर, जैसे किसी ने दबा गर्दन मेरी ,
कुछ टूटे रिश्ते , अधूरे सपने, भोले रास्ते और मरती सी सांस ,
यही चंद चीजे कमाई है मेने है मेने इस जिंदगी से।
पर सब कुछ वैसा नहीं है। दिल में अभी भी फूटता एक अंकुरित बीज ,
दुनिया की नज़रो से बचाकर रखा है मैंने , अपने भीतर।
देता हु इसे थोड़ी धूप उम्मीद की, थोड़ी मिटटी आवारापन की,
थोड़ी सी हवा तुम्हारी हसीं की, थोड़ी सी तपिस तुम्हारे छुअन की।
चलता मेरे संग , बिना कोई शिकायत किय ,
चुपचाप साथ साथ, मेरे भीतर।.
राजेश कुमार




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