पाठशाला
शरण्या, आज से आपकी जीवन की नवीन यात्रा प्रारंभ हो रही है। आज पाठशाला का पहला दिन है। अब यहाँ से आपको अकेले ही आगे बढ़ना होगा। अब आप अपने आँगन के सुरक्षा घेरे से बाहर निकल रहे हो। आपको ही इस कच्ची पगडण्डी में अपने पैर जमाकर चलना सीखना होगा। अब शायद हमारी आँखे हमेशा चौबीसों घंटे आपको नही देख पाएगी। अब कोई हाथ आपको गिरने से बचाने के नही होगा। जब आप गिर जाओगे तो आपको खुद ही उठना होगा। और यहाँ आपके पास रोने का कोई विकल्प भी नही होगा।
अब ये दुनिया आपको नए नए बहाने से अपना ज्ञान सिखाने की कोशिश करेगी। सब आपको, अपनी तरह बनाने की कोशिश करेंगे। पर आप किसी के ज्ञान को ऐसे ही नही अपनाना, सभी को धीरज से सुनना, उनके बाद उनकी बातो को अपने अनुभव के तराजू में तौलना, फिर उसके बाद ही जो अनुभव आपको होगा, वही सत्य आपका अपना ज्ञान होगा।
आप किसी और कि तरह बनने की कोशिश भी नही करना, क्योंकी तुम ही हो, तुम्हारी तरह, और तुम्हारे जैसा कोई और नही।
आपका जन्म जिस संस्कृति में हुआ है वह संसार की सबसे उत्कृष्ट सनातन संस्कृति है। जो अनादि काल से इस ब्रामाण्ड में प्रकट हुई है। ये एक खोजी संस्कृति है। ये महान विरासत अब आपके नन्हे हाथों में है। इस संस्कृति के मूल में ही, किसी पे विश्वास न करना है। सदा अनवरत सत्य की खोज करते रहना ही है।
आप भी अपनी जिज्ञासा को, अपने खोज में बदल देना, अपने प्रश्नों को कभी विश्राम नही देना, फिर चाहे दुनिया के सारे बुद्धिजीवि भी, तुम्हारे प्रश्नों से के आगे निरुक्ततर ही क्यों न हो जाये, तब भी आप शान्त नही बैठना, जिन प्रशनो के उत्तर ये दुनिया नही दे पाए, उसके उत्तर खुद ही ढूढ़ लेना।
आपके अंदर असीमित क्षमताएँ है आपके अंदर अनेक, अलौकिक शक्तियाँ छिपी हुई है। सही समय पर इन शक्तियों की पहचान, आप खुद ही कर लोगे।
आज से आपकी दो यात्रायें शुरू हो रही है एक इस दुनिया को जानने की समझने की, दूसरी खुद को पहचाने की, खुद की खोज करने की।
अभी आपके शिक्षक आपको अक्षर ज्ञान देंगे। ये ज्ञान आपके आने वाले भविष्य के ज्ञान का आधार है। अक्षर से अक्षर मिलकर शब्द बनेंगे।और शब्दो से संस्कृति, ये शब्द अनमोल है इन शब्दों का अपना एक अर्थ होता है। बिना अर्थ के कोई शब्द नही होता। और अर्थ ही जीवन को संचालित करता है। इसलिए अपने शब्दों का चयन बहुत सोच समझकर करना। जब तक अर्थ की पहचान न हो शब्दो को संजोकर रखना, इनको व्यर्थ न करना।
अभी की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा का लक्ष्य बहुत ही सीमित है, इसमें अर्थ को परिभाषित ही नही किया गया है। इस शिक्षा व्यवस्था में केवल जीवन यापन के संसाधनों को अर्जित करना सिखाया जाता है। इस तंत्र की सबसे की सबसे बड़ी कमी यही है कि व्यक्ती अपना सारा जीवन निजी संसाधनों को जुटाने में ही खर्च कर देता है। उसका समाज के उत्थान में योगदान नगणय हो जाता है।इसलिए आप अपनी सारी ऊर्जा इस शिक्षा तंत्र पे व्यर्थ न करना।
मैं चाहता हूँ आप अपना समय और ऊर्जा को एक आत्मनिर्भर समाज का सृजन करने में करो। अगर आपको ये समझना की आत्मनिर्भरता क्या है। तो हमारी प्रकृति को समझो। ये इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है। जैसे नदियों, तालाबो, झीलों और सागर से वाष्प के रूप में धीरे धीरे पानी लेती है, फिर धीरे धीरे ये वाष्प से बदलो का निर्माण करती है। और बारिश के रूप में जहाँ जितनी जरूरत होती है, उतनी वर्षा कर के वापस पानी लौटा देती है। यह प्रक्रिया बहुत ही धीमे और शान्त सतत चलती रहती है। और किसी दूसरे तंत्र में विघ्न भी नही पड़ता। इसका परिणाम शत प्रतिशत उपयोगी होता है। किसान को फसल पकाने के लिये पानी मिल जाता है, और पोखर कुआँ, नदी, नाले में भविष्य के उपयोग के लिये पानी भी इकट्ठा हो जाता है। ऐसे ही तंत्र को आत्मनिर्भर तंत्र कहते है।
इस संसार मे जितने भी व्यवस्था का संचालन होता है जितनी भी प्रक्रिया, गणित या विज्ञान है इन सबका उद्देश्य केवल मानव व समाज को, संसाधनों का सही अनुपात में वितरण कराना ही है।
पृथ्वी के पास सभी जीवों के, जरूरत को पूरा करने के पर्याप्त संसाधन उपलब्ध है पर मनुष्य की महत्वाकांक्षाओं के कारणों से सारे संसाधनों में, कुछ ही लोगो का अधिकार है। इन संसाधनों को पाने की कतार में खड़े समाज के आखिरी व्यक्ति को कुछ नही मिलता। इस व्यक्ति को उतना ही मिलता है जितना ऊपर वाले लोग छोड़ देते है। ट्रैन के जनरल कंपार्टमेंट में सफर करने वाला व्यक्ति, शहर में मजदूरी के लिये गांव छोड़ने वाला व्यक्ति या किसी छोटी सी पेंसन के लिये बाबुओ के झिड़की खाता व्यक्ति, न्याय के लिये पूरी जिंदगी प्रतीक्षा करता व्यक्ति, ये समाज का आखिरी व्यक्ति है। ऐसे व्यक्तियों का प्रतिशत बहुत अधिक है।
आपको एक ऐसे समाज का सृजन करना है। जहाँ सभी को उसके अधिकार के, संसाधनो की उपलब्धता, सुलभ हो सके। विभिन्न प्रकार के तंत्रो मे समन्वय स्थापित हो सके। और सभी लोग आत्मसम्मान और न्याय से अपना जीवन यापन कर सके। समाज मे खड़ा आख़िरी व्यक्ति भी अपने जीवन से संतुष्ट हो सके।
मैं चाहता हूँ आप इस अनंत यात्रा की शुरुआत समाज मे खड़े, इसी सबसे आखिरी व्यक्ति के साथ करो। ताकि अगर, भविष्य में आप कोई योग्यता अर्जित कर सको, या कोई ऊँचा पद प्राप्त करो, जहाँ आप में, समाज या किसी एक व्यक्ति के जीवन के स्तर को ऊँचा कर सकने की योग्यता हो, तो आप समाज मे खड़े आखिरी व्यक्ति को, कभी भी न भूल पाओ। समाज का आखिरी व्यक्ति ही आपकी नीति संरचना का केन्द्र बिंदु हो। तभी एक सम्पूर्ण आत्मनिर्भर समाज की कल्पना सकार होगी।
समाज निर्माण और आत्मा का ज्ञान, इन दोनो के सीखने का मार्ग आपको स्वंम को ही खोजना होगा। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था इसमे आपकी कोई सहायता नही कर पायेगी।
कृष्णा आपका मार्ग सुगम और रोमांचित करें। जीवन की नवीन यात्रा की अनंत शुभकामनाएं और ढेर सारा आशीर्वाद।
~आपके पापा
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