चुप्पी

कल मैं उसके घर गया था,
उसके पुराने घर में,
मुझे देखकर वो बहुत खुश हुई,
फिर बहुत गुस्सा हुई, पता नही,
उसने मम्मी से कहा ये मेरा खास दोस्त है,
फिर कहा दोस्त नही है, 
उसकी मम्मी ने कहा खाना खाकर जाना,
वो मेरे सामने आकर बैठ गई,
जाने कितने प्रश्न लेकर बैठी थी,
उसके चेहरे में कभी हंसी आ जाती,
कभी आंसू आ जाते,
फिर कभी बाहर देखती, 
कभी दोनो होंठो को दांतों में दवाकर
खुद को रोने से रोकने कोशिश करती,
कभी ज्वालामुखी जैसे सारा गुस्सा उतारने को होती
कभी अपने ही गुस्से से मुझ को बचाती,
पता नही कितने ज्वार, भाटा, बिजली तूफान को
समेटे थी अपने अंदर,
वो घर में सबको सब कुछ बताना चाहती थी,
पर ये भी चाहती थी की,
किसी को कुछ पता भी न चले,
घर में सब खुद ही समझ गए,
इतनी दूरी, इतनी खामोशी के बाद,

फिर उसके कहा आज रात यही रुकना,
कल दक्षिणेश्वर काली मंदिर चलेंगे।
अब जाना मत।

-राजेश 

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